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Tuesday, 30 June 2026
ज्यां पाल सार्त्र के अस्तित्ववाद की समाजशास्त्रीय व्याख्या
author(s)
डॉ. नीता वाजपेयी, डॉ शकील हुसैन
abstract
हीगल के बाद यूरोप के सामाजिक राजनीतिक चिंतन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला दर्शन है सार्त्र का अस्तित्ववाद। सार्त्र एक जटिल दार्शनिक है वह बहुत ही जटिल भाषा में साहित्य के माध्यम से सामाजिक राजनीतिक दर्शन देता है । इस शोध पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि एक सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के अस्तित्व की क्या स्थिति है और एक सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय अस्तित्व के बारे में सार्त्र ने क्या कहा है । सार्त्र को समानतः समाजशास्त्र में कम ही पढ़ा जाता है उसे एक राजनीतिक चिन्तक माना जाता है परंतु प्रस्तुत शोध पत्र में उसके अस्तित्व वाद की समाजशास्त्रीय विवेचना करने का प्रयास किया गया है । जिसमें मूल अध्ययन सामग्री सार्त्र की पुस्तक ‘बीइंग एंड नथिगनेस’ और ‘नोशिया’ है इसके अलावा सार्त्र के अस्तित्ववाद पर लिखी गई कुछ अन्य क्लासिक किताबों को भी अध्ययन सामग्री के रूप में प्रयुक्त किया गया है ।
कुंजी शब्द: अस्तित्ववाद, सार्त्र, एकांत, परायापन, उत्तर औद्योगिक समाज, बीइंग, समाज, मनुष्य ।
doi
Https://Doi.Org/10.61703/Re3
92-98 |
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How to cite this article:
वाजपेयी एन. हुसैन एस. (2023) : ज्यां पाल सार्त्र के अस्तित्ववाद की समाजशास्त्रीय व्याख्या Research Expression 6:9 p. 92-98 DOI:
Https://Doi.Org/10.61703/Re3